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Monday, April 26, 2010

जिंदगी ...



जिंदगी ...

कितनी बार लिख चूका हु तेरी कहानी
सुन चूका हु लोगो से तेरी जुबानी
हर वक्त तू बदल ही जाती है
कभी हिरा , कभी कांच हो जाती है
कभी पत्थर तो कभी नाजुक कली बन जाती है
हर वक्त लगता है
के मैंने पा लिया है तुझे
हर मोड़ पर रुक जाता हु
हताश होकर ...
जान जाता हु.. तुझे पाना
बहोत ही है कठिन ..
पर फिर से तू मुस्कुराती है
अपने बाहों में बुलाती है
और फिर से मै
तेरी और दौड़ने लगता हु..
छोटासा शिशु बनकर..

आज मेरा ये वादा है तुझसे
आज मै तुम्हे पाके ही रहूँगा
मेर नस नस में तुम्हे समाके ही रहूँगा
ऐ मेरी जिंदगी !

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